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रील्स के शोर में दबती तालियां : रंगकर्मियों की मांग जिले में हो थियेटर

सैय्यद फैज़ान शीबू रहमान

Thu, Feb 12, 2026
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निराला प्रेक्षागृह बना महंगा सौदा, आखिरी बड़ा नाटक 2016 में हुआ था

उन्नाव। कभी यह शहर नाटकों की गूंज से पहचाना जाता था। मंच सजता था तो दर्शकों की भीड़ खुद खिंची चली आती थी। सामाजिक मुद्दों पर आधारित प्रस्तुतियां लोगों को सोचने पर मजबूर करती थीं। रंगमंच सिर्फ मनोरंजन नहीं, समाज को आईना दिखाने का जरिया था। आज तस्वीर बदल चुकी है। रील और मोबाइल स्क्रीन के दौर में रंगमंच जैसे धीरे-धीरे गुम होता जा रहा है। जिले में न कोई समर्पित थियेटर है और न ही नियमित रिहर्सल के लिए स्थायी हॉल। कलाकार अपने दम पर किसी तरह अभ्यास करते हैं और निजी खर्च से मंचन की तैयारी करते हैं। संसाधनों और जगह की कमी ने उनकी राह और मुश्किल बना दी है। रंगकर्मियों का कहना है कि अगर एक स्थायी थियेटर और बुनियादी सुविधाएं मिल जाएं तो स्थानीय प्रतिभाओं को नया मंच मिल सकता है। फिलहाल स्थिति यह है कि जिले में कहीं भी ऐसा स्थान नहीं है जहां नियमित रूप से नाटकों का मंचन हो सके। ग्रामीण इलाकों में रामलीला जैसे आयोजनों के दौरान कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन जरूर करते हैं और सराहना भी पाते हैं, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। रंगमंच से जुड़े लोगों का मानना है कि अगर समय रहते पहल नहीं हुई तो यह कला सिर्फ यादों में सिमटकर रह जाएगी।

निराला प्रेक्षागृह पर सबसे ज्यादा सवाल

कभी निराला प्रेक्षागृह स्थानीय रंगमंच का केंद्र था। 1977 में अरविंद ने नाट्य शिल्पी संस्था की शुरुआत की थी। 1991 में ‘अमीबा’ और 1992 के राजनाट्य समारोह ने शहर को नई पहचान दी। बाद में प्रेक्षागृह प्रशासन के अधीन चला गया। अब वहां सरकारी और निजी कार्यक्रम होते हैं। किराया इतना अधिक है कि स्थानीय कलाकारों के लिए मंचन करना मुश्किल हो जाता है। तकनीकी सुविधाओं को लेकर भी शिकायतें हैं। 2016 में जब्बार अकरम के नाटक ‘अद्भुत मानव’ के बाद से यहां बड़े मंचन लगभग बंद हैं। रंगकर्मियों का कहना हैं कि अगर मंच ही नहीं मिलेगा तो रंगमंच कैसे बचेगा? निराला प्रेक्षागृह को रंगकर्मियों के लिए रियायती या निःशुल्क किया जाना चाहिए।

कमल श्रीवास्तव बोले – उन्नाव में प्रतिभा है, मंच की कमी है

वरिष्ठ रंगकर्मी कमल श्रीवास्तव ने कहा कि उन्नाव का रंगमंच कभी सामाजिक सरोकारों से जुड़ी प्रस्तुतियों के लिए जाना जाता था। सीमित संसाधनों में भी कलाकारों ने मजबूत पहचान बनाई। नाटक केवल मनोरंजन नहीं, समाज को दिशा देने का माध्यम थे। उन्होंने कहा कि डिजिटल दौर में मंच की चमक फीकी पड़ी है, लेकिन जीवंत अभिनय का विकल्प आज भी नहीं है। निराला प्रेक्षागृह को स्थानीय कलाकारों के लिए रियायती या निःशुल्क किया जाए और जिले में एक समर्पित थियेटर बनाया जाए। उनका मानना है कि प्रशासन, समाज और शिक्षण संस्थानों के सहयोग से ही रंगमंच को फिर से सक्रिय किया जा सकता है। मंच मिलेगा तो प्रतिभा खुद रास्ता बना लेगी।

मनीष सेंगर की स्पष्ट मांग

मंच संयोजक मनीष सिंह सेंगर ने मांग उठाई है कि जिले में कम से कम एक समर्पित थियेटर होना चाहिए, जो स्थानीय रंगकर्मियों के लिए निःशुल्क उपलब्ध हो। उनका कहना है कि जब खेल के लिए स्टेडियम बन सकते हैं तो कला के लिए थियेटर क्यों नहीं? अगर प्रशासन एक ऐसा हॉल उपलब्ध करा दे जहां कलाकार बिना किराए के रिहर्सल और मंचन कर सकें, तो रंगमंच को नई ऊर्जा मिलेगी।

सुरेंद्र वर्मा बोले – संस्कृति बचाने के लिए ठोस कदम जरूरी

श्री साईं दरबार सेवा समिति के संस्थापक एवं सर्व धर्म संसद के प्रदेश अध्यक्ष सुरेंद्र वर्मा ने भी रंगकर्मियों की मांग का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि रंगमंच केवल मनोरंजन नहीं, समाज को दिशा देने का माध्यम है। अगर स्थानीय कलाकारों को मंच नहीं मिलेगा तो हमारी सांस्कृतिक विरासत कमजोर होगी। प्रशासन को चाहिए कि जिले में एक समर्पित और निःशुल्क थियेटर की व्यवस्था करे, ताकि युवा पीढ़ी कला से जुड़े। उन्होंने यह भी कहा कि सामाजिक संस्थाओं को आगे आकर रंगकर्मियों का सहयोग करना चाहिए और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देना चाहिए।

जब्बार अकरम बोले – मंच से ही बनती है मजबूत नींव

वरिष्ठ रंगकर्मी जब्बार अकरम ने कहा कि रंगमंच किसी भी कलाकार की असली पाठशाला है। आज कई युवा एक-दो रील बनाकर टीवी और फिल्मों में पहुंचने की जल्दी में रहते हैं, लेकिन अभिनय की गहराई मंच से आती है। कैमरे के सामने कुछ सेकंड दिखना आसान है, पर मंच पर घंटों दर्शकों को बांधे रखना बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा कि थियेटर अनुशासन, संवाद की समझ और आत्मविश्वास सिखाता है। बिना कड़ी मेहनत और रिहर्सल के बाद ही बड़ा अवसर नहीं मिलता। उन्नाव में प्रतिभा है, जरूरत एक समर्पित और निःशुल्क थियेटर की है, जहां युवा खुद को निखार सकें और सही दिशा में आगे बढ़ सकें।

अब बच्चे पूछते हैं, वीडियो कब आएगा?

वरिष्ठ रंगकर्मी मोहम्मद सलीम बताते हैं कि उन्होंने किशोरावस्था से अभिनय शुरू किया था। पहले एक नाटक की तैयारी महीनों चलती थी। संवाद सिर्फ याद नहीं किए जाते थे, उन्हें जिया जाता था। अब माहौल बदल गया है। सोशल मीडिया के छोटे वीडियो ने दर्शकों की आदत बदल दी है। लोग कम समय में मनोरंजन चाहते हैं। मंच की तैयारी और उसकी गंभीरता को समझने वाले कम होते जा रहे हैं। वरिष्ठ रंगकर्मी रुमी रहमान कहते हैं कि पहले तालियां हमारी सबसे बड़ी कमाई थीं। अब युवा कलाकार मंच की तारीख से ज्यादा वीडियो अपलोड की तारीख पूछते हैं।

प्रशिक्षण और संगठन की जरूरत

वरिष्ठ रंगकर्मी रिज़वान अख्तर का कहना है कि वर्षों से नाटक करने के बावजूद कलाकारों के लिए स्थायी आर्थिक व्यवस्था नहीं बन सकी। रिज़वान मानते हैं कि कलाकारों को एकजुट होकर अपनी बात प्रशासन तक पहुंचानी होगी। उनका मानना है कि अगर प्रोत्साहन और बुनियादी ढांचा मिले तो युवा इस क्षेत्र में करियर बना सकते हैं। बच्चन पांडे का कहना है कि रंगमंच को बचाना केवल कलाकारों की जिम्मेदारी नहीं, समाज की भी है। उन्नाव के रंगकर्मी आज भी मंच को अपनी पहचान मानते हैं। उनके पास प्रतिभा और अनुभव है। जरूरत है तो सिर्फ एक ऐसे मंच की, जहां फिर से तालियों की गूंज सुनाई दे सके। अब देखना यह है कि प्रशासन और समाज इस मांग पर कितना गंभीर कदम उठाते हैं।

Tags :

Unnao, THE LUCKNOW TIMES, uttar Pradesh news

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