: गंगा-जमुनी तहज़ीब का प्रतीक बना दशहरा, मुस्लिम परिवार निभा रहा परंपरा
सैय्यद फैज़ान शीबू रहमान
Thu, Oct 2, 2025
धार्मिक विवादों से दूर रहकर भाईचारे और एकता का संदेश देते हैं मोहम्मद अरमान
सैय्यद फैज़ान शीबू रहमान
उन्नाव। दशहरे के पर्व पर जहां चारों ओर उल्लास और उमंग का माहौल है, वहीं इस मौके पर जिले में गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल भी देखने को मिल रही है। शुक्लागंज क्षेत्र के मनोहर नगर के रहने वाले एक मुस्लिम परिवार बीते चार पीढ़ियों से रावण की प्रतिमाएँ बनाकर हिंदू समाज के इस प्रमुख पर्व में अहम भूमिका निभा रहा है। यह परंपरा महज कारोबार नहीं, बल्कि सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे का जीता-जागता उदाहरण है। परिवार के लोग इसे जिम्मेदारी और गर्व दोनों मानते हुए निभा रहे हैं।
1950 से चली आ रही परंपरा
परिवार के वर्तमान सदस्य मोहम्मद अरमान बताते हैं कि इस परंपरा की शुरुआत उनके दादा ने वर्ष 1950 में की थी। तब से लेकर अब तक तीन पीढ़ियाँ यह जिम्मेदारी निभा चुकी हैं और अब चौथी पीढ़ी भी उसी समर्पण के साथ इसे आगे बढ़ा रही है। इस साल राजधानी मार्ग पर होने वाले दशहरा महोत्सव के लिए विशालकाय रावण की प्रतिमा तैयार करने की जिम्मेदारी भी अरमान ने ही संभाली है।
उन्नाव से बाहर तक जाती हैं प्रतिमाएँ
अरमान के अनुसार, उनके परिवार द्वारा तैयार की गई प्रतिमाएँ केवल उन्नाव ही नहीं, बल्कि हरमापुर, जाजमऊ स्टेट, लाल बंगला, श्याम नगर सहित आसपास के कई क्षेत्रों में भी दहन के लिए भेजी जाती हैं। उनका मानना है कि यह काम केवल रोज़गार का जरिया नहीं, बल्कि एक परंपरा और विरासत है, जिसे निभाना उनका फर्ज है।

नई पीढ़ी को सौंपेंगे जिम्मेदारी
अरमान कहते हैं कि जैसे उनके दादा और पिता ने इस जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा से निभाया, वैसे ही वह चाहते हैं कि भविष्य में उनके बच्चे भी इस परंपरा को आगे बढ़ाएँ। उनके मुताबिक दशहरा केवल धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि इसमें समाज को जोड़ने और सांप्रदायिक एकता का संदेश छिपा है।
विवादों से परे, धर्म का सम्मान
धार्मिक नारों और विवादों पर अरमान का कहना है, “हम इस काम को कारोबार की नजर से देखते हैं। कोई ‘आई लव मोहम्मद’ कहे या ‘आई लव महादेव’, यह उनकी व्यक्तिगत आस्था है। इसका हमारे काम से कोई लेना-देना नहीं है। हम अपने धर्म का पालन करते हुए दूसरों के धर्म का सम्मान करते हैं और समाज में अपनी भूमिका निभाते हैं।”
नौकरी के साथ निभा रहे परंपरा
अरमान और उनके परिवार के सदस्य आम दिनों में अपनी-अपनी नौकरियों में व्यस्त रहते हैं, लेकिन जैसे ही दशहरा नजदीक आता है, पूरा परिवार जुटकर प्रतिमाएँ तैयार करता है। यही वजह है कि हर साल लोग उनके बनाए रावण के दहन का बेसब्री से इंतजार करते हैं।
साझा संस्कृति का संदेश
यह परंपरा केवल कला या कामकाज भर नहीं है, बल्कि सही मायनों में गंगा-जमुनी तहज़ीब और सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक है। दशहरे जैसे हिंदू पर्व में मुस्लिम परिवार का योगदान इस बात का प्रमाण है कि भारतीय त्योहार केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि साझा संस्कृति और सामाजिक मेल-जोल के सेतु हैं।
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