दोस्तीनगर पुल से जाम का झंझट होगा खत्म : 12 मीटर चौड़े नए पुल को शासन की मंजूरी
Sun, Dec 28, 2025
उन्नाव। उन्नाव–हरदोई राज्यमार्ग पर दोस्तीनगर में शारदा नहर पर रोज लगने वाले जाम से अब लोगों को बड़ी राहत मिलने जा रही है। शासन ने यहां लघु सेतु निर्माण को मंजूरी दे दी है। करीब 1.93 करोड़ रुपये की लागत से 12 मीटर चौड़ा और 25 मीटर लंबा नया पुल बनाया जाएगा। यह पुल बनने के बाद वर्षों पुरानी यातायात समस्या काफी हद तक खत्म हो जाएगी। फिलहाल दोस्तीनगर के पास शारदा नहर पर बनी पुलिया महज पांच मीटर चौड़ी है। यह मार्ग स्टेट हाईवे घोषित है और इस पर दिन-रात भारी वाहनों की आवाजाही बनी रहती है। पुलिया संकरी होने के कारण एक समय में केवल एक ही वाहन निकल पाता है। दूसरी ओर से आने वाले वाहनों को रोकना पड़ता है, जिससे थोड़ी-थोड़ी देर में जाम की स्थिति बन जाती है। कई बार जाम इतना बढ़ जाता है कि वाहन चालकों को लंबा इंतजार करना पड़ता है। स्थानीय लोगों और वाहन चालकों की परेशानी को देखते हुए लंबे समय से पुलिया को चौड़ा करने या नया पुल बनाने की मांग की जा रही थी। लोक निर्माण विभाग ने स्थिति का जायजा लेकर नए पुल के निर्माण का प्रस्ताव तैयार किया और शासन को भेजा था। अब प्रस्ताव को स्वीकृति मिलने के साथ ही बजट भी जारी कर दिया गया है। यह मार्ग यातायात की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी सड़क से एक ओर बांगरमऊ होते हुए हरदोई की तरफ वाहन जाते हैं। दूसरी ओर चकलवंशी के रास्ते कानपुर और बिठूर का संपर्क होता है। वहीं मोहान और हसनगंज के जरिए लखनऊ जाने वाले वाहन भी इसी मार्ग का उपयोग करते हैं। ऐसे में दोस्तीनगर पुलिया पर लगने वाला जाम पूरे इलाके की यातायात व्यवस्था को प्रभावित करता है। लोक निर्माण विभाग की योजना है कि पुराने पुलिया के बगल में ही नया पुल बनाया जाए, ताकि निर्माण कार्य के दौरान यातायात पूरी तरह बाधित न हो। पुराने पुल से आवागमन चलता रहेगा और लोग परेशानी से बच सकेंगे। पीडब्ल्यूडी निर्माण खंड के एक्सईएन सुबोध कुमार ने बताया कि शारदा नहर पर लघु सेतु निर्माण को मंजूरी मिल चुकी है और इसके लिए 1,93,77,000 रुपये का बजट स्वीकृत हुआ है। प्रयास रहेगा कि निर्माण कार्य समय पर पूरा किया जाए और जल्द से जल्द पुल को यातायात के लिए खोल दिया जाए। नए पुल के निर्माण की मंजूरी मिलने से क्षेत्र के लोगों में उम्मीद जगी है। रोजाना जाम से जूझने वाले वाहन चालकों को अब राहत मिलने की आस है। माना जा रहा है कि पुल बन जाने के बाद इस मार्ग पर यातायात सुचारु होगा और लोगों का सफर सुरक्षित व आसान हो जाएगा।
जीरो डिस्चार्ज का सपना अधूरा : हर साल माघ मेले में चर्म उद्योग को उठाना पड़ रहा नुकसान
Sat, Dec 27, 2025
111 करोड़ की योजना वर्षों से लटकी, मार्च 2026 तक बढ़ी समय सीमा
उन्नाव। बंथर औद्योगिक क्षेत्र में स्थित कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) का अपग्रेड समय पर पूरा न होना जिले के चर्म उद्योग के लिए लगातार संकट बनता जा रहा है। जीरो डिस्चार्ज व्यवस्था लागू न हो पाने के कारण हर साल माघ मेले के दौरान टेनरियों पर पानी बहाने की पाबंदी लगाई जाती है। इस बार भी हालात कुछ अलग नहीं हैं। 46 दिन की अवधि में 24 दिन तक टेनरियों को संचालन सीमित रखना होगा, लेकिन उद्योग जगत का कहना है कि व्यावहारिक रूप से इसका असर पूरे डेढ़ महीने तक पड़ेगा। चर्म उद्योग से जुड़े उद्यमियों का कहना है कि यदि सीईटीपी का अपग्रेड तय समय पर पूरा हो गया होता तो न तो उत्पादन रोकना पड़ता और न ही करोड़ों के नुकसान का सामना करना पड़ता। मौजूदा स्थिति में बंथर और दही चौकी औद्योगिक क्षेत्र की करीब 40 छोटी-बड़ी टेनरियों का लगभग पांच करोड़ रुपये का कारोबार प्रभावित होने की आशंका है। इससे न सिर्फ उद्योग बल्कि इससे जुड़े सैकड़ों श्रमिकों की आजीविका पर भी असर पड़ रहा है। दरअसल वर्ष 2017 में बंथर और दही चौकी स्थित सीईटीपी राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के तय मानकों पर खरे नहीं उतर पाए थे। इसके बाद इन्हें आधुनिक और पर्यावरण अनुकूल बनाने की योजना तैयार की गई। बंथर सीईटीपी को जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (जेडएलडी) प्रणाली पर अपग्रेड करने के लिए नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (एनएमसीजी) परियोजना के तहत केंद्र सरकार ने 111 करोड़ रुपये की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) को मंजूरी दी। इस परियोजना में उद्योगों से जुड़े उद्यमियों की भी अहम हिस्सेदारी है और उन्हें कुल लागत का करीब 25 प्रतिशत, यानी लगभग 27 करोड़ रुपये का योगदान देना है। सीईटीपी के अपग्रेड का काम सितंबर 2022 में शुरू हुआ था और इसे फरवरी 2025 तक पूरा किया जाना था, लेकिन तय समय सीमा निकल जाने के बावजूद काम अधूरा है। कभी श्रमिकों की कमी तो कभी मशीनों और जरूरी सामग्री की आपूर्ति में देरी के चलते परियोजना की रफ्तार धीमी पड़ती रही। अब एक बार फिर समय सीमा बढ़ाकर 31 मार्च 2026 कर दी गई है, जिससे उद्यमियों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। चर्म उद्योग संघ उन्नाव चैप्टर के सचिव मो. ताज आलम का कहना है कि चमड़ा बनाने की प्रक्रिया बेहद संवेदनशील होती है। टेनिंग की प्रक्रिया पूरी होने में 30 से 40 दिन का समय लगता है और इसे बीच में रोकना संभव नहीं होता। यदि प्रक्रिया अधूरी रह जाए तो चमड़े की गुणवत्ता खराब हो जाती है और पूरा माल बेकार हो सकता है। इसी वजह से 24 दिन की पाबंदी को व्यवहारिक रूप से पूरे डेढ़ महीने की पाबंदी माना जाता है। जब तक टेनरियों को पूरी तरह संचालन की अनुमति नहीं मिलती, तब तक उत्पादन ठप ही रहता है। सीईटीपी के अपग्रेड के बाद यहां अत्याधुनिक तकनीक के उपकरण लगाए जाने हैं। इनसे ट्रीटमेंट के बाद निकलने वाले पानी से क्रोमियम, फ्लोराइड, केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (सीओडी), पीएच, बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) और सस्पेंडेड सॉलिड जैसे प्रदूषक तत्व अलग किए जा सकेंगे। इससे एक ओर गंगा नदी में जाने वाला प्रदूषण कम होगा, वहीं दूसरी ओर उद्योगों को बार-बार पानी रोकने की मजबूरी से भी राहत मिलेगी।
सीईटीपी प्रबंधन का कहना है कि काम लगातार जारी है। जीएम सीईटीपी रितुराज साहू के अनुसार ट्रीटमेंट और प्यूरिफिकेशन यूनिट में आधुनिक मशीनें लगाई जा रही हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि मशीनों की आपूर्ति और श्रमिकों की उपलब्धता को लेकर कुछ दिक्कतें आईं, जिससे काम प्रभावित हुआ, लेकिन अब मार्च 2026 की समय सीमा के भीतर परियोजना को पूरा कर लिया जाएगा। फिलहाल हालात यह हैं कि सीईटीपी के अधूरे अपग्रेड का खामियाजा हर साल चर्म उद्योग को भुगतना पड़ रहा है। उद्यमियों को उम्मीद है कि यदि इस बार तय समय पर काम पूरा हो गया तो आने वाले वर्षों में माघ मेले और अन्य अवसरों पर उत्पादन रोकने की समस्या से निजात मिलेगी और उन्नाव का चर्म उद्योग फिर से स्थिर रफ्तार पकड़ सकेगा।
कागजों में साफ माइनर : हकीकत में झाड़ियों में दबी जलधारा
Mon, Dec 22, 2025
अचलगंज क्षेत्र में मुख्य माइनरों की अधूरी सफाई, वर्षों से टेल तक नहीं पहुंचा पानी
उन्नाव। जनपद में माइनरों की सिल्ट सफाई एक बार फिर सवालों के घेरे में है। हर साल की तरह इस बार भी कागजों में तो सफाई पूरी दिखाई गई, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। हालात यह हैं कि जहां सड़क से गुजरने वालों की नजर पड़ती है, वहीं तक माइनर चमचमाती दिखती है और उसके आगे जाते ही झाड़ियां, खरपतवार और जमी सिल्ट पानी के रास्ते को पूरी तरह रोक देती है। ऐसे में टेल तक पानी पहुंचने की उम्मीद किसानों के लिए सिर्फ एक सपना बनकर रह गई है। सिकंदरपुर कर्ण क्षेत्र में खेती पूरी तरह माइनरों पर निर्भर है। यही माइनर क्षेत्र के सैकड़ों किसानों की फसल की जीवनरेखा हैं। मगर सिल्ट सफाई में लगातार हो रही अनदेखी और भ्रष्टाचार के चलते किसानों को हर साल पानी के संकट से जूझना पड़ता है। क्षेत्र की प्रमुख माइनर मुगलपुर इसका सबसे बड़ा उदाहरण बन चुकी है। बेहटी गोपालपुर के पास से गुजरने वाली माइनर में अचलगंज-गंगाघाट मुख्य मार्ग के किनारे सिर्फ करीब तीन सौ मीटर तक ही सफाई की गई। सड़क किनारे तक माइनर साफ दिखे, इसके लिए मशीनें खूब चलीं, लेकिन उसके आगे पूरी माइनर झाड़ियों में गुम है। पानी बहने का रास्ता कहीं नजर नहीं आता। किसानों का कहना है कि ठेकेदारों का तरीका हर साल एक जैसा रहता है। जहां आम आदमी और अधिकारी आसानी से देख सकें, वहां तक सफाई कर दी जाती है, ताकि निरीक्षण में सब ठीक नजर आए। लेकिन जो हिस्से गांवों के भीतर और खेतों के पास हैं, वहां न तो मशीन पहुंचती है और न ही फावड़ा चलता है। नतीजा यह कि पानी आगे बढ़ ही नहीं पाता। अचलगंज माइनर की हालत भी इससे अलग नहीं है। कस्बे से आगे बलउखेड़ा गांव के बाद माइनर की पहचान ही मिटती जा रही है। ग्रामीण बताते हैं कि करीब बीस साल से बलउखेड़ा के आगे माइनर में पानी नहीं पहुंचा। खेत सूखे पड़े हैं और किसान बारिश के भरोसे खेती करने को मजबूर हैं। ग्रामीणों और किसानों में इस स्थिति को लेकर भारी नाराजगी है। उनका कहना है कि हर साल सफाई के नाम पर लाखों रुपये खर्च होने की बात कही जाती है, लेकिन फायदा जमीन पर दिखाई नहीं देता। अगर समय रहते पूरी माइनर की सफाई नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में खेती पर इसका और बुरा असर पड़ेगा।
इस पूरे मामले पर शारदा खंड उन्नाव के अधिशासी अभियंता गगन कुमार शुक्ल ने कहा कि शिकायत उनके संज्ञान में आई है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि मामले की जांच कराई जाएगी और जहां-जहां सफाई अधूरी है, वहां पूरी माइनर की सिल्ट सफाई कराई जाएगी, ताकि पानी टेल तक पहुंच सके। अब देखना यह है कि जांच और आश्वासन कागजों तक सीमित रहते हैं या वास्तव में खेतों तक पानी पहुंचाने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया जाता है। किसानों की नजरें एक बार फिर सिस्टम पर टिकी हैं।