आज एक ही दिन 'देवता' और 'गुरु' का प्रकाश : कार्तिक पूर्णिमा पर दो महापर्वों का महासंगम; गूंजे 'एक ओंकार' के संदेश, गंगा घाटों पर जलाए गए लाखों दीप!
THE LUCKNOW TIMES
Wed, Nov 5, 2025
नई दिल्ली/उत्तर प्रदेश : दरअसल भारतीय पंचांग के सबसे पवित्र दिनों में से एक, कार्तिक पूर्णिमा, आज बुधवार, 5 नवंबर 2025 को मनाई जा रही है। इस तिथि का महत्व इसलिए और भी बढ़ जाता है क्योंकि आज एक साथ दो विशाल धार्मिक पर्वों का महासंगम हो रहा है, सिखों के प्रथम गुरु, गुरु नानक देव जी का 556वां 'प्रकाश पर्व' और 'देव दीपावली' (त्रिपुरारी पूर्णिमा)। पूरा देश आज भक्ति, ज्ञान, दीपों की रोशनी और मानवता की सेवा के रंग में सराबोर है।
ज्ञान और प्रेम का 'प्रकाश पर्व': गुरु नानक जयंती
सिख धर्म के संस्थापक और पहले गुरु, गुरु नानक देव जी के जन्मोत्सव के रूप में आज का दिन 'गुरुपर्व' या 'प्रकाश पर्व' के नाम से मनाया जा रहा है।
मूल संदेश: गुरु नानक देव जी ने अपने उपदेशों से 'इक ओंकार' (ईश्वर एक है) का संदेश दुनिया को दिया। उन्होंने मानवता, समानता, सेवा और सत्य पर ज़ोर दिया, जो आज भी समाज को प्रेरणा देते हैं।
उत्सव: देश भर के गुरुद्वारों को फूलों और दीपों से भव्य रूप से सजाया गया है। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में विशेष कीर्तन और अखंड पाठ का आयोजन किया जा रहा है।
नगर कीर्तन और लंगर: गुरुपर्व के उपलक्ष्य में, नगर कीर्तन निकाले जा रहे हैं, जिनमें श्रद्धालु भजन-कीर्तन करते हुए गुरु के संदेशों का प्रसार कर रहे हैं। गुरुद्वारों में लंगर (सामुदायिक भोजन) की सेवा अनवरत जारी है, जो गुरु की 'सेवा' और 'समानता' के सिद्धांत को चरितार्थ करती है।
देवताओं की 'दीपावली': देव दीपावली का दिव्य नजारा
कार्तिक पूर्णिमा को 'देव दीपावली' के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक मान्यता है कि इस दिन सभी देवी-देवता पृथ्वी पर आते हैं और काशी के गंगा घाटों पर स्नान करते हैं।
पौराणिक कथा: इस दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध किया था, जिसकी खुशी में देवताओं ने दीप जलाकर उत्सव मनाया था, इसलिए इसे त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहते हैं।
घाटों पर दीपदान: वाराणसी, हरिद्वार और अन्य पवित्र नदियों के घाटों पर लाखों की संख्या में दीप जलाए जा रहे हैं। गंगा के किनारे जलते दीपों की यह अलौकिक छटा मन मोह रही है, जो अंधकार पर प्रकाश की जीत का प्रतीक है।
स्नान और दान का महत्व: श्रद्धालु आज के दिन गंगा स्नान को विशेष रूप से पुण्यकारी मानते हैं। स्नान के बाद दीपदान, अन्नदान और वस्त्रदान करने की परंपरा है, जिससे सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
आज का यह दिन भारतीय संस्कृति की उस अनूठी विशेषता को दर्शाता है, जहाँ विभिन्न धर्मों के महापर्व एक ही तिथि पर आकर, एकता और मानवता के विशाल संदेश को पूरे विश्व में फैलाते हैं।
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