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: इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक जजमेंट, दुष्कर्म-हत्या के दोषी की फांसी सजा को उम्रकैद में बदला, कहा-सुधरने का मिलना चाहिए मौका!

THE LUCKNOW TIMES

Sat, Sep 6, 2025
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इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक जजमेंट, दुष्कर्म-हत्या के दोषी की फांसी सजा को उम्रकैद में बदला, कहा-सुधरने का मिलना चाहिए मौका!

  उत्तर प्रदेश प्रयागराज : दरअसल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाबालिग चचेरी बहन से दुष्कर्म और हत्या के दोषी को दी गई मृत्युदंड की सजा को आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया है, सजा के खिलाफ अपील और फांसी के रेफरेंस पर सुनवाई करने के बाद कोर्ट ने कहा कि सजा भुगत रहा व्यक्ति आपराधिक पृष्ठभूमि का नहीं है, यह नहीं कहा जा सकता है कि वह सुधरने योग्य नहीं है और समाज के लिए खतरा है,उसे सुधरने व पुनर्वास का मौका मिलना चाहिए, यह आदेश न्यायमूर्ति राजीव गुप्ता व न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्र की पीठ ने फिरोजाबाद के युवक की ओर से दाखिल अपील पर दिया!   आपको बता दें फिरोजाबाद के युवक पर 17 मार्च 2019 को आठ वर्षीय पीड़िता के साथ दुष्कर्म व हत्या करने के आरोप में मुकदमा दर्ज कराया गया था. आरोप था पीड़िता पड़ोस में गई थी और लापता हो गई. पीड़िता की मां को ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने उसकी बेटी को आरोपी के साथ देखा था, 18 मार्च 2019 को पीड़िता का शव गेहूं के खेत में मिला. ट्रायल कोर्ट ने इसे भयावह घटना माना. कहा कि आरोपी पीड़िता को बिस्किट दिलाने के बहाने फुसलाकर खेत में ले गया और उसके साथ दुष्कर्म किया, इसके बाद हत्या कर दी. कोर्ट ने दोषी करार देते हुए मौत की सजा सुनाई. इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई निर्दोष साबित करने में हुआ असफलः अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि डीएनए जांच के लिए शव से लिए गए नमूनों को फोरेंसिक जांच के लिए कभी नहीं भेजा गया. पीड़िता उसकी चचेरी बहन थी, इसलिए उसके खिलाफ इस तरह का नृशंस कृत्य करने का कोई कारण नहीं था. केवल पीड़ित के साथ आखिरी बार देखे गए सबूत ही हैं, जो किसी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए निर्णायक नहीं है. शासकीय अधिवक्ता ने दलील दी कि पीड़ित को आखिरी बार आरोपी के साथ देखा गया था. ऐसे में आरोपी साक्ष्य अधिनियम के तहत यह बताने के लिए बाध्य है कि उसके बाद पीड़ित के साथ क्या हुआ, वह ऐसा करने में विफल रहा और इस प्रकार यह दोषसिद्धि का एक उचित मामला है.  

कार्ट ने निचली अदालत के फैसले को भी माना सही

  कोर्ट ने कहा कि एक बार तथ्यों के गवाहों के साक्ष्य से अंतिम बार देखे जाने का तथ्य साबित हो जाने के बाद आरोपी पर यह साबित करने का भार था कि उसने पीड़िता को कहां और कब छोड़ा. अदालत ने कहा कि वह यह बताने में विफल रहा. इसलिए ट्रायल कोर्ट के आदेश में कोई त्रुटि नहीं है. आरोपी की कम उम्र और अंतिम बार एक साथ देखे जाने के परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित मामले को देखते हुए मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया!

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