स्वास्थ्य विभाग में गबन का बड़ा मामला : लिपिक पर गाज गिरी,वार्डबॉय लापता
Sat, Nov 29, 2025
पहली जांच में बचा लिपिक, दूसरी रिपोर्ट में ही दोष साबित
उन्नाव। रोगी कल्याण समिति के फंड में हुए करीब 20 लाख रुपये के गबन की जांच अब नई दिशा पकड़ चुकी है। ताजा कार्रवाई में जिला अस्पताल के वरिष्ठ सहायक लिपिक को निलंबित कर दिया गया है। जांच अधिकारियों का कहना है कि लिपिक अपनी जिम्मेदारियों को खुद निभाने के बजाय वार्डबॉय से ट्रेजरी और मेडिकोलीगल से जुड़े संवेदनशील काम कराता था। इसी लापरवाही को आगे बढ़ाकर गबन की आशंका भी जताई गई है। फिलहाल जांच पूरी होने तक लिपिक को कानपुर मंडल कार्यालय से अटैच कर दिया गया है।
19.98 लाख रुपये गायब, वार्डबॉय मार्च से लापता
जांच में सामने आया कि शहर के जुराखन खेड़ा निवासी वार्डबॉय विनय यादव ट्रेजरी रिकॉर्ड, पैसे जमा कराने और मेडिकोलीगल रिपोर्ट का काम देख रहा था, जबकि ये जिम्मेदारी स्टाफ अधिकारी और लिपिक की होती है। 18 मार्च से वह अस्पताल से नदारद है। इसी अवधि में अप्रैल 2024 से मार्च 2025 तक 19 लाख 98 हजार से अधिक की राशि बैंक खाते में जमा नहीं की गई। रिकॉर्ड मेल नहीं खाने पर गड़बड़ी का शक पकड़ा गया।
शिकायत डिप्टी सीएम तक पहुंची, पहली जांच में वार्डबॉय पर पूरा दोष
धनराशि गुम होने का मामला जब डिप्टी सीएम बृजेश पाठक तक पहुंचा तो उन्होंने तत्काल जांच के निर्देश दिए। सीनियर डॉक्टरों की तीन सदस्यीय समिति ने प्रारंभिक जांच की थी। रिपोर्ट में पूरे दोष का ठीकरा वार्डबॉय पर फोड़ते हुए उसके खिलाफ एफआईआर कराई गई। उसका और पटल प्रभारी का बैंक खाता भी सीज करा दिया गया। जांच रिपोर्ट निदेशालय भेज दी गई, पर ऊपरी स्तर पर इसे आधा अधूरा माना गया और फिर से पड़ताल शुरू कराई गई।
दूसरी जांच में सामने आया लापरवाही का बड़ा छेद
अपर निदेशक डॉ. जीपी गुप्ता ने नई जांच टीम गठित की। इस बार मामला पलट गया। टीम ने पाया कि बैंक में रकम जमा कराने और निकासी की जिम्मेदारी वरिष्ठ लिपिक निक्षांत कुमार की थी। लेकिन लिपिक ने यह जिम्मेदारी वार्डबॉय को थमा दी थी। यह भी शक जताया गया कि ऐसा जानबूझकर किया गया, ताकि धन की हेराफेरी आसान हो सके। टीम की रिपोर्ट के आधार पर लिपिक को निलंबित कर दिया गया।
आगे की जांच अब कानपुर मंडल में
अपर निदेशक ने कहा कि बिंदुवार जांच में लिपिक के स्तर पर गंभीर गड़बड़ी मिली है। इसलिए पद से हटाकर उन्हें कानपुर मंडल कार्यालय भेजा गया है। आगे की विस्तृत जांच वहीं से आगे बढ़ेगी और जिम्मेदारी के पूरे चेन की तह तक जांच की जाएगी। कुल मिलाकर जिला अस्पताल का यह मामला सरकारी धन की सुरक्षा प्रणाली की कमजोरी को उजागर करता है। वार्डबॉय से नियम विरुद्ध तरीके से काम कराने और करीब 20 लाख रुपये खाते में न पहुंचने का सवाल अब जवाब मांग रहा है। जांच आगे बढ़ेगी तो यह सामने होगा कि रकम कहां गई और किस स्तर पर खेल खेला गया।
प्लाईवुड फैक्ट्री में लगी भीषण आग : आग की लपटें देख मची भगदड़ व चीख पुकार!
Thu, Nov 27, 2025
उत्तर प्रदेश बरेली
: दरअसल जनपद के थाना बिथरी चैनपुर क्षेत्र में बुधवार रात्रि उस वक़्त हड़कम्प मच गया।ग्राम उड़ला समीप स्थित एक प्लाईवुड फैक्ट्री में अचानक आग की भीषण लपटें उठने लगीं।बुधवार रात्रि करीब 9 बजे उठी आग की लपटों को देख आस-पास के तमाम लोग घबरा कर अपने घरों से बाहर निकल आए और सम्पूर्ण इलाके में अफरा- तफरी का माहौल बन गया।कुछ ही मिनटों में आग ने लिया विकराल रूप ले लिया जहाँ फैक्ट्री से धुँआ उठता देख कर्मचारियों ने आग लगने की सूचना फायर बिग्रेड विभाग को दी जहाँ पहुँची फायर बिग्रेड टीम ने आग की लपटों पर काबू पाने का प्रयास किया किन्तु फैक्ट्री के अंदर प्लाईबुड व कच्ची लकड़ी तथा भारी मात्रा में मौजूद ज्वलनशील सामग्री का स्टॉक होने कारण आग तेजी से फैलती गई।
मौके पर पहुँची फायर ब्रिगेड की कई गाड़ियाँ
घटना की सूचना पर फायर ब्रिगेड की कई गाड़ियाँ मौके पर पहुँची जहाँ दमकल कर्मियों ने आग पर रेशक्यूँ चलाकर आग पर काबू पाने की लाख कोशिशें की किन्तु आग की डरावनी लपटों ने टीम को बेवस कर दिया।आस पास के घरों में रहने वाले लोग भी अपने घरों से बाहर निकल आए और सुरक्षित स्थानों पर पहुँच गए। दमकल समेत पुलिस ने मौके पर पहुँच हालात पर काबू पाया।
ज्वलनशील सामग्री से और भड़की आग
फैक्ट्री के अंदर प्लाईबोर्ड व लकड़ी तथा केमिकल भरी सामग्री भारी मात्रा में मौजूद थी जिससे आग तेजी से फैलती गई इसी वजह से कुछ ही देर में आग ने विकराल रूप धारण कर लिया जिसे नियंत्रित करने में दमकल कर्मियों को भारी मशक्कत का सामना करना पड़ा।फिलहाल आग लगने का कारण ज्ञात नहीं हो सका है दमकल विभाग व थाना पुलिस मामले की जाँच में जुटी है आग की लपटों में लाखों का नुकसान की आसंका जताई जा रही है।
रेडियोएक्टिव सुरक्षा में चूक उजागर : दही औद्योगिक क्षेत्र की यूनिट बंद
Wed, Nov 26, 2025
सुरक्षा उल्लंघन पर तत्काल कार्रवाई, यूनिट दो महीने तक निगरानी में
उन्नाव। दही औद्योगिक क्षेत्र की शांत पड़ी फैक्ट्री बुधवार को अचानक फिर चर्चा में आ गई, जब मुंबई स्थित अणुशक्ति भवन और परमाणु ऊर्जा विभाग की 12 सदस्यीय विशेषज्ञ टीम यहां पहुंची। करीब सात साल से बंद पड़े मेसर्स इम्पार्शियल एग्रोटेक प्राइवेट लिमिटेड के गामा रेडिएशन प्रोसेसिंग प्लांट में मौजूद रेडियोएक्टिव पदार्थों और सुरक्षा मानकों की बारीकी से जांच की गई। सुबह ग्यारह बजे टीम ने पुलिस और जिला प्रशासन की मौजूदगी में यूनिट का निरीक्षण शुरू किया और लगभग दो घंटे तक प्लांट के भीतर तकनीकी मूल्यांकन चलता रहा। निरीक्षण में रेडियोधर्मी पदार्थों के संरक्षण से जुड़ी महत्वपूर्ण कमियां पाई गईं, जिसके बाद यूनिट को तत्काल प्रभाव से सील कर दिया गया। यह वही यूनिट है, जहां 2018 तक मांस और अन्य खाद्य सामग्री को गामा किरणों के माध्यम से संरक्षित किया जाता था, ताकि वह लंबे समय तक खराब न हो। इस प्रक्रिया में कोबाल्ट 60 जैसा रेडियोएक्टिव तत्व उपयोग में लाया जाता है, जिसे केवल लाइसेंस और निर्धारित सुरक्षा प्रोटोकॉल पूरा होने पर ही भाभा एटोमिक रिसर्च सेंटर (बीएआरसी) उपलब्ध कराता है। लाइसेंस की वैधता पूरी होने के बाद भी संयंत्र में मौजूद रेडियोएक्टिव सामग्री का सुरक्षित संरक्षण मानकों के अनुसार न मिलने पर विशेषज्ञ दल हरकत में आया। टीम ने निरीक्षण के बाद स्पष्ट किया कि फैसलिटी में रख-रखाव कमजोर पाया गया है और स्थिति को देखते हुए अब अगले दो महीनों में रेडियोएक्टिव पदार्थ को नियंत्रित रूप से हटाया जाएगा। तब तक किसी भी व्यक्ति का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा और परिसर पुलिस निगरानी में रहेगा। टीम के आने के साथ ही औद्योगिक क्षेत्र और शहर में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं। दोपहर तक लोगों में यह सवाल घूमता रहा कि आखिर वैज्ञानिक दल क्यों पहुंचा और क्या रेडिएशन रिसाव जैसी कोई स्थिति बनी है। हालांकि निरीक्षण के बाद अधिकारियों ने साफ किया कि हालात नियंत्रण में हैं और खतरे जैसी कोई स्थिति नहीं है। कार्रवाई केवल सुरक्षा प्रोटोकॉल पूरा न होने के कारण की गई है।
वर्ष 2018 से बंद, फिर भी अंदर मौजूद था रेडियोएक्टिव मैटेरियल
जानकारी के मुताबिक यह यूनिट साल 2018 से अप्रचालक अवस्था में पड़ी थी। यहां पहले मांस और सब्जियों जैसे खाद्य पदार्थों को खराब होने से बचाने के लिए फूड ई-रेडिएशन तकनीक का उपयोग होता था। इस प्रक्रिया में कोबाल्ट-60 नामक रेडियोएक्टिव तत्व इस्तेमाल किया जाता है। यह सामग्री बीएआरसी द्वारा निश्चित अवधि और लाइसेंस के बाद ही उपलब्ध कराई जाती है। समय सीमा पूरी होने के बाद भी रेडियोएक्टिव पदार्थ गोदाम में सुरक्षित तरीके से संरक्षित न मिलने पर वैज्ञानिकों ने तत्काल कार्रवाई की। सुबह लगभग 11 बजे स्टेशन डायरेक्टर एसके कावरे के नेतृत्व में टीम ने प्लांट के गोदाम में प्रवेश किया। निरीक्षण दो घंटे तक चला और सुरक्षा के मद्देनजर पुलिस बल भी तैनात रहा। जांच पूरी होने के बाद मुख्य गेट को सील कर दिया गया और किसी भी व्यक्ति के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
कैसे काम करता है ई-रेडिएशन प्लांट
फूड ई-रेडिएशन एक तकनीक है जिसमें खाद्य सामग्री को गामा किरणों से उपचारित कर बैक्टीरिया और परजीवियों को नष्ट किया जाता है। इससे मांस जैसे उत्पादों की शेल्फ लाइफ कई गुना बढ़ जाती है। इसी प्रक्रिया में कोबाल्ट-60 से निकलने वाला विकिरण उपयोग किया जाता है। सामान्य परिस्थितियों में यह मैटेरियल मोटे स्टील शील्ड में बंद रहता है, लेकिन रख-रखाव में कमी हो तो रिसाव का खतरा बढ़ सकता है। यही वजह है कि इस तरह की यूनिट में सुरक्षा मानक सर्वोच्च स्तर के होते हैं।
दो महीने में हटेगा रेडियोधर्मी पदार्थ
टीम ने गोदाम में मौजूद रेडियोएक्टिव मटेरियल सुरक्षित ढंग से वापस ले जाने के लिए दो माह का समय तय किया है। इस अवधि तक इकाई बंद रहेगी और परिसर में प्रवेश नहीं किया जा सकेगा। गार्ड रूम और मुख्य द्वार को बैरिकेड कर पुलिस निगरानी बढ़ा दी गई है।
जिले में अफवाहों का दौर, पर राहत भी
टीम के आने की खबर बाहर आते ही कई तरह की चर्चाएं फैल गईं। कुछ लोग इसे रेडिएशन लीक से जोड़ते रहे, जबकि कुछ ने इसे हालिया विस्फोटों से लिंक किया। हालांकि दोपहर बाद जब अधिकारियों ने पुष्टि की कि टीम केवल रेडियोएक्टिव पदार्थ वापस लेने और सुरक्षा जांच के लिए आई है, तो स्थिति सहज हुई। इधर, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आरओ शशि बिंदकर ने बताया कि यदि रेडिएशन लीक की आशंका होती तो आधा किलोमीटर का क्षेत्र सील कर दिया जाता और विशेषज्ञ सूट के साथ निरीक्षण होता। ऐसे में खतरे जैसी कोई स्थिति नहीं थी, जनता को परेशान होने की जरूरत नहीं है।
जिला व राष्ट्रीय स्तर की संयुक्त मौजूदगी
निदेशक सिक्योरिटी एंड कोर्डिनेशन, परमाणु ऊर्जा विभाग भारत सरकार, अणुशक्ति भवन मुंबई की ओर से गठित केंद्रीय टीम ने जिला प्रशासन को 14 नवंबर को ही सूचित कर दिया था कि वे 26 नवंबर को निरीक्षण के लिए उन्नाव आएंगे। तय तिथि पर विशेषज्ञ दल पहुंचा, जिसमें एसके करवारे स्टेशन डायरेक्टर एनएपीएस नरौरा, किरन सोनावाने डायरेक्टर सिक्योरिटी एंड कोर्डिनेशन डीएई, आरबी राकेश एसओ एसओ हेड आरआरएचपीएस एचपीडी बीएआरसी, आरकेबी यादव एसओजी हेड ईपीआरएस आरएसएसडी बीएआरसी, डीएम राने एओएफ एईआरबी, दीपक शर्मा एसओ (एफ) डीएई और अभिमन्यु सरकार एसओ (ई) एईआरबी शामिल थे।
केंद्रीय टीम के साथ जिले की प्रशासनिक टीम भी मौजूद रही। इसमें नगर मजिस्ट्रेट राजीव राज, अपर पुलिस अधीक्षक अखिलेश सिंह, उपायुक्त उद्योग और जिला उद्योग प्रोत्साहन व उद्यमिता विकास केंद्र से करुणा राय, कनिष्ठ सहायक यूपीसीडा, सहायक पर्यावरण अभियंता तथा उप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अवर अभियंता शामिल रहे। निरीक्षण के दौरान सभी अधिकारियों ने संयुक्त रूप से दस्तावेज, इकाई से संबंधित अभिलेख और सुरक्षा मानकों की स्थिति का परीक्षण किया।
रेडिएशन यूनिट अगले आदेश तक बंद
दही औद्योगिक क्षेत्र स्थित गामा रेडिएशन यूनिट सुरक्षा मानकों का अनुपालन न होने पर सील कर दी गई है। अब दो माह में रेडियोएक्टिव तत्व हटाए जाएंगे और तब तक प्लांट बंद रहेगा। निरीक्षण के बाद स्पष्ट हो गया है कि स्थिति नियंत्रण में है। प्रशासन और विशेषज्ञ लगातार निगरानी में हैं और जनजीवन पर किसी खतरे की पुष्टि नहीं है।