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जीरो डिस्चार्ज का सपना अधूरा : हर साल माघ मेले में चर्म उद्योग को उठाना पड़ रहा नुकसान

सैय्यद फैज़ान शीबू रहमान

Sat, Dec 27, 2025
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111 करोड़ की योजना वर्षों से लटकी, मार्च 2026 तक बढ़ी समय सीमा

उन्नाव। बंथर औद्योगिक क्षेत्र में स्थित कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) का अपग्रेड समय पर पूरा न होना जिले के चर्म उद्योग के लिए लगातार संकट बनता जा रहा है। जीरो डिस्चार्ज व्यवस्था लागू न हो पाने के कारण हर साल माघ मेले के दौरान टेनरियों पर पानी बहाने की पाबंदी लगाई जाती है। इस बार भी हालात कुछ अलग नहीं हैं। 46 दिन की अवधि में 24 दिन तक टेनरियों को संचालन सीमित रखना होगा, लेकिन उद्योग जगत का कहना है कि व्यावहारिक रूप से इसका असर पूरे डेढ़ महीने तक पड़ेगा। चर्म उद्योग से जुड़े उद्यमियों का कहना है कि यदि सीईटीपी का अपग्रेड तय समय पर पूरा हो गया होता तो न तो उत्पादन रोकना पड़ता और न ही करोड़ों के नुकसान का सामना करना पड़ता। मौजूदा स्थिति में बंथर और दही चौकी औद्योगिक क्षेत्र की करीब 40 छोटी-बड़ी टेनरियों का लगभग पांच करोड़ रुपये का कारोबार प्रभावित होने की आशंका है। इससे न सिर्फ उद्योग बल्कि इससे जुड़े सैकड़ों श्रमिकों की आजीविका पर भी असर पड़ रहा है। दरअसल वर्ष 2017 में बंथर और दही चौकी स्थित सीईटीपी राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के तय मानकों पर खरे नहीं उतर पाए थे। इसके बाद इन्हें आधुनिक और पर्यावरण अनुकूल बनाने की योजना तैयार की गई। बंथर सीईटीपी को जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (जेडएलडी) प्रणाली पर अपग्रेड करने के लिए नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (एनएमसीजी) परियोजना के तहत केंद्र सरकार ने 111 करोड़ रुपये की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) को मंजूरी दी। इस परियोजना में उद्योगों से जुड़े उद्यमियों की भी अहम हिस्सेदारी है और उन्हें कुल लागत का करीब 25 प्रतिशत, यानी लगभग 27 करोड़ रुपये का योगदान देना है। सीईटीपी के अपग्रेड का काम सितंबर 2022 में शुरू हुआ था और इसे फरवरी 2025 तक पूरा किया जाना था, लेकिन तय समय सीमा निकल जाने के बावजूद काम अधूरा है। कभी श्रमिकों की कमी तो कभी मशीनों और जरूरी सामग्री की आपूर्ति में देरी के चलते परियोजना की रफ्तार धीमी पड़ती रही। अब एक बार फिर समय सीमा बढ़ाकर 31 मार्च 2026 कर दी गई है, जिससे उद्यमियों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। चर्म उद्योग संघ उन्नाव चैप्टर के सचिव मो. ताज आलम का कहना है कि चमड़ा बनाने की प्रक्रिया बेहद संवेदनशील होती है। टेनिंग की प्रक्रिया पूरी होने में 30 से 40 दिन का समय लगता है और इसे बीच में रोकना संभव नहीं होता। यदि प्रक्रिया अधूरी रह जाए तो चमड़े की गुणवत्ता खराब हो जाती है और पूरा माल बेकार हो सकता है। इसी वजह से 24 दिन की पाबंदी को व्यवहारिक रूप से पूरे डेढ़ महीने की पाबंदी माना जाता है। जब तक टेनरियों को पूरी तरह संचालन की अनुमति नहीं मिलती, तब तक उत्पादन ठप ही रहता है। सीईटीपी के अपग्रेड के बाद यहां अत्याधुनिक तकनीक के उपकरण लगाए जाने हैं। इनसे ट्रीटमेंट के बाद निकलने वाले पानी से क्रोमियम, फ्लोराइड, केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (सीओडी), पीएच, बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) और सस्पेंडेड सॉलिड जैसे प्रदूषक तत्व अलग किए जा सकेंगे। इससे एक ओर गंगा नदी में जाने वाला प्रदूषण कम होगा, वहीं दूसरी ओर उद्योगों को बार-बार पानी रोकने की मजबूरी से भी राहत मिलेगी।
सीईटीपी प्रबंधन का कहना है कि काम लगातार जारी है। जीएम सीईटीपी रितुराज साहू के अनुसार ट्रीटमेंट और प्यूरिफिकेशन यूनिट में आधुनिक मशीनें लगाई जा रही हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि मशीनों की आपूर्ति और श्रमिकों की उपलब्धता को लेकर कुछ दिक्कतें आईं, जिससे काम प्रभावित हुआ, लेकिन अब मार्च 2026 की समय सीमा के भीतर परियोजना को पूरा कर लिया जाएगा। फिलहाल हालात यह हैं कि सीईटीपी के अधूरे अपग्रेड का खामियाजा हर साल चर्म उद्योग को भुगतना पड़ रहा है। उद्यमियों को उम्मीद है कि यदि इस बार तय समय पर काम पूरा हो गया तो आने वाले वर्षों में माघ मेले और अन्य अवसरों पर उत्पादन रोकने की समस्या से निजात मिलेगी और उन्नाव का चर्म उद्योग फिर से स्थिर रफ्तार पकड़ सकेगा।

Tags :

Unnao, THE LUCKNOW TIMES, uttar Pradesh news

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